मई दिवस : श्रम, संघर्ष और एकजुटता का क्रांतिकारी घोष

May Day: A revolutionary declaration of labor, struggle, and solidarity

के. डी. सिंह: 01 मई दुनिया के मजदूरों का पर्व। 8 घंटे कार्य-दिवस के अधिकार की ऐतिहासिक जीत का दिन, या यूँ कहें कि यह एक क्रांतिकारी चेतना का दिवस है। यह वह तारीख है जब 01 मई 1886 को शिकागो में काम के 8 घंटे की मांग को लेकर हुए संघर्ष में शहीद हुए मजदूरों और उनके नेताओं को याद किया जाता है। यह दिन हेमार्केट कांड की स्मृति से जुड़ा है, जब मजदूरों की शांतिपूर्ण सभा पर गोलियाँ चलाई गईं। सैकड़ों मजदूरों ने अपनी जान गंवाई, और बाद में अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाईज, सैमुअल फिल्डन, माइकल श्वेब, एडोल्फ फिशर, जॉर्ज एंगल और लुईस लिंग जैसे नेताओं को फांसी या कठोर दंड दिया गया। उनका “अपराध” सिर्फ इतना था कि वे इंसान के लिए इंसान जैसी जिंदगी — 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे अपने बच्चों एवं परिवार के लिए की मांग कर रहे थे। मई दिवस केवल श्रद्धांजलि का दिन नहीं, बल्कि संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प है। यह वह दिन है जब दुनिया भर के मजदूर वर्ग ने यह साबित किया कि संगठित शक्ति किसी भी दमनकारी व्यवस्था को चुनौती दे सकती है। यह दिवस महिला मजदूरों के सम्मान का भी प्रतीक है। वे केवल श्रम शक्ति नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशील और सृजनशील धुरी हैं। उत्पादन से लेकर सामाजिक पुनर्निर्माण तक उनकी भूमिका निर्णायक रही है। संघर्षों ने उन्हें इतिहास के केंद्र में स्थापित किया। इस आंदोलन ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। कार्ल मार्क्स का नारा “दुनिया के मजदूरों, एक हो!” केवल विचार नहीं रहा, बल्कि एक वैश्विक आंदोलन बन गया। भारत में भी इस चेतना ने मजदूर आंदोलनों को नई दिशा दी और पूरे दुनिया में 8 घंटे काम का कानून बना। भारत में मुंबई, सोलापुर, पंजाब और बंगाल में श्रमिक संघर्ष तेज हुए और मजदूरों ने राजनीतिक स्वतंत्रता को भी अपना लक्ष्य बनाया। इसी दबाव का परिणाम था कि 1926 में ब्रिटिश सरकार को ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 लागू करना पड़ा। 1928 में पार्क सर्कस मैदान में हजारों मजदूरों ने समाजवादी गणतंत्र का नारा बुलंद कर मजदूर-किसान एकता की ताकत को प्रदर्शित किया। आज भी मजदूर और किसान इस देश की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिये पर रखा गया है। स्थायी और अस्थायी मजदूरों के बीच विभाजन, आउटसोर्सिंग की व्यवस्था और श्रम कानूनों में बदलाव ने उनकी स्थिति को और जटिल बना दिया है। आज मोदी सरकार ने सभी श्रमिक कानून को खत्म कर चार लेबर कोर्ड में बदल दिया और काम के घंटे को बढ़ा दिया। सरकार की इस नीति के खिलाफ देश के कोने-कोने के मजदूर आंदोलनरत हैं. आज वैश्विक परिदृश्य और भी चिंताजनक है। इज़राइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध की परिस्थितियाँ दुनिया के मेहनतकश लोगों के लिए नए संकट पैदा कर रही हैं। युद्ध कभी भी शासक वर्गों के हितों का टकराव होता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत मजदूर, किसान और आम जनता चुकाती है। विस्थापन, महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा ये सब युद्ध की ही देन हैं। इसके अलावा पर्यावरण भी असंतुलित होती है और समस्त जीव जगत परेशान होता है। ऐसे समय में जरूरत है वास्तविक लोकतंत्र की जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य को बाजार से मुक्त रखा जाए, महंगाई पर नियंत्रण हो और श्रमिकों को उनके श्रम का सम्मान मिले। जो किसान अपनी मेहनत से अन्न उपजाता है, उसे कर्ज के बोझ से मुक्ति मिले। जल जंगल जमीन पर दलित आदिवासी सभी किसानों का अधिकार हो। भगत सिंह, सहजानंद सरस्वती, एस. ए. डांगे, मुजफ्फर अहमद और जेड. ए. अहमद जैसे नेताओं ने जिस मजदूर-किसान राज्य की कल्पना की थी, वह आज भी अधूरी है लेकिन संघर्ष जारी है। मई दिवस हमें याद दिलाता है कि अधिकार कभी दिए नहीं जाते, उन्हें संघर्ष से हासिल करना पड़ता है।
(लेखक के. डी. सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव हैं)

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