क्या कम्युनिस्ट देशद्रोही होते हैं?
Are communists traitors?
(मूल बांग्ला आलेख : मोहम्मद सलीम, अनुवाद : संजय पराते)
क्या हमारे देश के कम्युनिस्ट गैर-भारतीय हैं? यदि नहीं, तो फिर कम्युनिस्टों से ज़्यादा देशभक्त होने का दावा कौन कर सकता है? 1921 में, कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में, कम्युनिस्ट ही थे, जिन्होंने सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता की माँग उठाई थी — जिसका आह्वान मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानंद ने किया था। इसके अगले वर्ष, गया अधिवेशन में, कम्युनिस्टों ने फिर से यह माँग उठाई थी। उस समय गांधीजी इससे नाराज़ हुए थे। आठ साल बाद, 1929 में, कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन ने आखिरकार पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) के आह्वान को स्वीकार कर लिया। 1931 में, कराची अधिवेशन ने एक स्वतंत्र भारत की रूपरेखा तैयार की।आज़ादी की लड़ाई और आज़ाद भारत को गढ़ने में कम्युनिस्टों ने एक निर्णायक भूमिका निभाई : उन्होंने कई अहम मुद्दों को राष्ट्रीय एजेंडा में शामिल करवाया, बेमिसाल कुर्बानियाँ दीं और अपनी जान न्योछावर करते हुए शहीद हुए। इस अहम तथ्य पर गौर करें — 1943 में बंबई में हुई कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महाधिवेशन में, 15,563 सदस्यों की नुमाइंदगी करने वाले 139 प्रतिनिधियों ने कुल मिलाकर 411 साल जेल में बिताए थे। सीधे शब्दों में कहें तो : पार्टी के नेताओं ने अपनी सियासी ज़िंदगी का आधे से ज़्यादा हिस्सा सलाखों के पीछे बिताया था। मिसाल के तौर पर, कल्पना दत्ता और कमला चटर्जी, दोनों को ही साढ़े सात साल जेल में रहना पड़ा था। जिस वक़्त कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था, उस समय भी पार्टी के 695 सदस्य जेल में बंद थे.जिनमें से 105 सदस्य उम्र कैद की सज़ा काट रहे थे।आज़ादी के बाद, नए भारत के निर्माण से जुड़ी हर बड़ी बहस में कम्युनिस्ट मौजूद थे। उन्होंने ज़मीन के अधिकारों का मुद्दा उठाया — और तेभागा से लेकर तेलंगाना तक, ज़मींदारों और जागीरदारों का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने भूमि सुधार के मुद्दे को राष्ट्रीय एजेंडे में शामिल करने के लिए दबाव डाला। उन्होंने भाषाई विविधता को मान्यता दिलाने और भाषाई आधार पर राजनीतिक सीमाओं को फिर से तय करने के लिए संघर्ष किया। उन्होंने भारत की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों तथा सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।1931 की शुरुआत में ही, कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने ‘ड्राफ़्ट प्लेटफ़ॉर्म ऑफ़ एक्शन’ में सबसे पहले जाति व्यवस्था और छुआछूत को खत्म करने की मांग की थी।तो फिर देशद्रोही कौन हैं? और देशभक्त कौन हैं? क्या सावरकर और बाजपेयी देशभक्त थे, जिन्होंने अंग्रेजों के प्रति वफ़ादारी की कसमें खाई थीं? क्या वे लोग देशभक्त थे, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के साथ विश्वासघात करके उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया था? या फिर भगत सिंह और लक्ष्मी सहगल देशभक्त थे? क्या वे लोग देशभक्त हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था, बल्कि असल में उन्होंने तो अंग्रेजी राज की मदद ही की? या फिर खुदीराम बोस, सूर्य सेन और कल्पना दत्ता देशभक्त थे? क्या वह ‘संघ’ देशभक्त था, जिसने अंग्रेजों के शासन में सक्रिय रूप से उनकी मदद की थी — या फिर वे मुस्लिम देशभक्त हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और अपना खून बहाया था? क्या सिद्धू, कान्हू और बिरसा मुंडा — और उनके साथ अनगिनत अन्य आदिवासी — देशभक्त नहीं थे?क्या वे लोग असली गद्दार नहीं हैं, जो भारत के सार्वजनिक उद्योगों को विदेशी खरीददारों को कौड़ियों के भाव बेच रहे हैं — और साथ ही जल, जंगल और खदानों की बेरोकटोक लूट की इजाज़त दे रहे हैं? क्या वे लोग देश के साथ गद्दारी नहीं कर रहे हैं, जो करोड़ों रुपयों के कर-राजस्व को गायब करने की साज़िश रचते हैं और जो अपनी अवैध संपत्ति छिपाकर देश से फरार हो जाते हैं?असली बात यह है कि कम्युनिस्ट एक ही समय में देशभक्त भी होते हैं और अंतर्राष्ट्रीयतावादी भी। अपने देश के प्रति प्रेम और दुनिया भर के मेहनतकश लोगों के साथ एकजुटता के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं है।माओ ने स्वयं एक बार यह सवाल उठाया था : “क्या एक कम्युनिस्ट, जो एक अंतर्राष्ट्रीयतावादी है, उसी समय एक देशभक्त भी हो सकता है? हमारा मानना है कि वह न केवल हो सकता है, बल्कि उसे होना ही चाहिए। हम एक साथ अंतर्राष्ट्रीयतावादी भी हैं और देशभक्त भी, और हमारा नारा है : आक्रमणकारियों से मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करो।”
और यहाँ, एक बार फिर, हम रवींद्रनाथ की ओर लौटते हैं, और मार्क्स की ओर भी।
“देशभक्ति” और “राष्ट्रवाद” शब्द भले ही एक जैसे लगें, लेकिन इन शब्दों का अर्थ एक नहीं हैं। “देशभक्ति” का मतलब “भक्ति-भाव वाला राष्ट्रवाद” नहीं है। “प्रेम” में असहमति और विरोध की गुंजाइश होती है। इसके विपरीत, “भक्ति” का अर्थ है आँख मूँदकर आज्ञा मानना — बिना कोई सवाल किए पूरी तरह से समर्पित हो जाना। हम प्रेम के पक्ष में खड़े हैं, न कि आँख मूँदकर की जाने वाली किसी भक्ति के। अपने देश के प्रति सच्चा प्रेम समर्पण का भाव है — न कि दूसरों के प्रति नफ़रत या हिंसा का भाव।ठीक उसी देश में, जहाँ ‘जहाँ भय-मुक्त है मन’ लिखा गया था, अब आबादी के एक बड़े हिस्से से यह उम्मीद की जा रही है कि वे अपना सिर झुकाएँ और शासक के आदेशों का पालन करें। अपने उपन्यास ‘घरे बाइरे’ (घर और दुनिया) में, पात्र निखिलेश यह टिप्पणी करते हैं : “जो लोग अपने देश के प्रति प्रेम जताने के लिए ‘माँ, माँ!’ चिल्लाते हैं और प्रार्थनाएँ गाते हैं — उनका प्रेम वास्तव में देश के लिए नहीं, बल्कि नशे के लिए होता है।” और रवींद्रनाथ, पात्र बिमला के माध्यम से, निखिलेश के इस दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं — “उन्होंने कहा : मैं अपने देश की सेवा करने के लिए तत्पर हूँ, लेकिन जिसकी मैं आराधना करूँगा, वह देश से कहीं ऊपर है। यदि मैं स्वयं देश की ही आराधना करूँ, तो देश का विनाश हो जाएगा।”संघी गिरोह का सवाल यह है : मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्टालिन के चित्र क्यों होने चाहिए? हमारी पार्टी के राज्य कार्यालय में, सचिवमंडल के बैठक कक्ष में, इनमें से किसी का भी चित्र नहीं है। वहाँ केवल रवींद्रनाथ का चित्र है — जिसे किसी और ने नहीं, बल्कि सनातन दिंडा ने बनाया है। उसके नीचे कॉमरेड मुज़फ़्फ़र अहमद की प्रतिमा है। इस इमारत का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। दिल्ली में स्थित केंद्रीय कार्यालय का नाम ए.के. गोपालन भवन है। पार्टी की नई इमारत का नाम हरकिशन सिंह सुरजीत भवन है। और सीपीआई का केंद्रीय कार्यालय अजय भवन है। वहीं दूसरी ओर, नेपाल में संघ का एक सहयोगी संगठन है एचएसएस, जो अपना मुख्यालय ‘केशव धाम’ के नाम से चलाता है — और दिल्ली में ‘केशव कुंज’ है। बीरगंज में, प्रधानाचार्य के कक्ष का नाम ‘हेडगेवार कक्ष’ रखा गया है, और तीसरी मंज़िल पर गोलवलकर का चित्र लगा है।लेकिन — और इसके लिए ईमानदारी से आत्म-मंथन की ज़रूरत है — कम्युनिस्ट पार्टी के शुरुआती सालों में, इसमें शामिल होने वाले ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे, मध्यम-वर्ग के, या तुलनात्मक रूप से संपन्न लोग थे। नतीजन, राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम अक्सर रूसी, यूरोपीय या अंग्रेज़ी मॉडलों से प्रेरणा लेते थे। अगर पार्टी का आधार किसानों और मज़दूरों के बीच ज़्यादा मज़बूत होता, तो शायद “क्लास रूम” मॉडल कभी सामने ही नहीं आता। जहाँ किसान आंदोलन मज़बूत थे, वहाँ नामों में भी इसकी झलक मिलती थी — जैसे कृषक प्रजा पार्टी, महाराष्ट्र की किसान और मज़दूर पार्टी। अख़बारों के नाम थे — लांगल (हल), नवयुग, धूमकेतु, स्वाधीनता। फिर भी, रचे गए गीत अक्सर भाटियाली, भवाइया, गम्भीरा, झूमुर या अन्य लोक-शैलियों के बजाय यूरोपीय और रूसी धुनों की नकल करते थे। बाद में, इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन — भारतीय जन नाट्य संघ) ने स्थानीय मिट्टी की उस देसी शैली को फिर से अपनाया। कबीर, नानक, बाबा फरीद और लालन पर और ज़्यादा ध्यान दिया जा सकता था। जहाँ एक ओर यूरोप अभी भी मध्ययुगीन सोच में फँसा हुआ था, वहीं भारत पहले से ही एक सांप्रदायिकता-मुक्त, प्रगतिशील और सौहार्द्रपूर्ण परंपरा विकसित कर रहा था। अगर हमने उस परंपरा को और ज़्यादा सचेत होकर संवारा होता, तो आज हम कहीं ज़्यादा मज़बूत होते।गानों में लोक-धुन होनी चाहिए। भाषा सरल और स्थानीय होनी चाहिए, जो रोज़मर्रा की बोलचाल से ली गई हो। केरल और पश्चिम बंगाल में, यह काफ़ी हद तक किया गया। बंगाल में, जुलूस, सुबह की प्रभात-फेरी, सामूहिक गायन, फूलों की वर्षा, और स्वागत के तौर पर माथे पर चंदन का टीका — जिसमें महिलाएँ लाल किनारी वाली साड़ियाँ पहनती हैं और पुरुष स्वयंसेवक सफ़ेद पजामा-कुर्ता — ये सभी बंगाली संस्कृति का हिस्सा हैं। खाकी निकर, फुल पैंट, या हाथ में लाठियाँ और त्रिशूल— इनमें से कोई भी चीज़ किसी भी भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है।सच तो यह है कि हम लोगों को अभी भी एक लंबी दूरी तय करना है। भारतीय संस्कृति को किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं किया जा सकता। कोई भी ऐसी प्रथा, जो हमें जकड़ती हो, हम उसका बोझ नहीं ढोएँगे। हमें उसे त्याग देना चाहिए। और जो कुछ भी हमें आगे बढ़ाता है — हम उसे एक सुनहरे धागे की तरह अपनाएँगे और अपने आचरण के माध्यम से उसका प्रसार करेंगे।और इस तरह, हम एक बार फिर रवींद्रनाथ के साथ अपनी बात का समापन करते हैं। उनकी समझ यह थी : भारतीय सभ्यता बहु-स्तरीय है। किसी एक परत को अलग करके उसे ही भारतीय परंपरा का संपूर्ण रूप घोषित कर देना एक भूल है। इसके अलावा, भारतीय —यानी पूर्वी सभ्यता — और पश्चिमी सभ्यता के बीच कोई बुनियादी विरोध नहीं है ; बल्कि, उनके बीच एक गहरा जुड़ाव और संबंध मौजूद है। इसलिए, हमें खुले मन से निर्णय लेना चाहिए। जो कुछ भी हमें आनंद देता है — चाहे उसका उद्गम कहीं भी हो — वह हमारा ही है। और जो कुछ भी दोषपूर्ण है, उसे हमें केवल इसलिए स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि वह हमारी अपनी ही धरती से उपजा है। (अमर्त्य सेन, नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद शांतिनिकेतन में दिया गया भाषण).
हम भी यही विश्वास रखते हैं/
अपने खोल से बाहर निकलो,/
खुले में आकर खड़े हो जाओ ;/
अपने हृदय के भीतर ही तुम सुनोगे/
समस्त संसारों की प्रतिध्वनि।
(लेखक माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य और पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।



