Palamu News: सूखाग्रस्त से बाहर निकालने के लिए केवल कागजी योजनाओं की नहीं, बल्कि जमीनी इच्छाशक्ति की है जरूरत
Palamu News: To lift the region out of drought, what is needed is not merely paper-based schemes, but rather grassroots-level political will.
संजय पांडेय वरिष्ठ पत्रकार
पलामू, जो झारखंड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण जिला है, अपनी खनिज संपदा और ऐतिहासिक गौरव के लिए जाना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि यहाँ की 80% आबादी कृषि पर निर्भर होने के बावजूद, आज भी खेती ‘मानसून के जुए’ के समान है। पलामू में नदियाँ और प्राकृतिक ढलान होने के बाद भी पलामू के किसान प्यासे है। सिंचाई की बदहाली, सरकारी उदासीनता की वजह से किसानों का भविष्य अंधकारमय हो चुका है।हम बात करते हैं सिंचाई व्यवस्था के असफल होने के आखिर प्रमुख कारण क्या हैं: पलामू में सिंचाई की विफलता के पीछे केवल प्रकृति ही नहीं, बल्कि ढांचागत और प्रशासनिक कमियां भी जिम्मेदार हैं। पलामू की भूमि पथरीली और ढलान वाली है। यहाँ बारिश तो होती है, लेकिन पानी तेजी से बहकर सोन या कोयल नदी के रास्ते निकल जाता है। जल को रोकने के लिए चेकडैम और तालाबों का संजाल अधूरा है। कई नहरें तो बनी हैं, लेकिन अंतिम छोर (Tail end) तक पानी नहीं पहुँच पाता। लिफ्ट इरिगेशन (लिफ्ट सिंचाई) योजनाओं के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति न होना एक बड़ा रोड़ा है। यहां की पुरानी नहरों की सालों से उड़ाही (सफाई) नहीं हुई है। इससे नहरों की जल धारण क्षमता खत्म हो गई है और पानी खेतों के बजाय बर्बाद हो जाता है। पलामू में अल्पवृष्टि के कारण पारंपरिक जल स्रोत जैसे कुएं और आहार-पाइन समय से पहले सूख जाते हैं। अभी भी समय है कि यहां की कई योजनाएं जिन्हें तत्काल ‘अमली जामा’ पहनाना जरूरी है। पलामू की प्यास बुझाने के लिए निम्नलिखित योजनाओं को युद्धस्तर पर पूरा करना अनिवार्य है। कोयल-कारो और उत्तर कोयल परियोजना (मंडल डैम): दशकों से लंबित इस योजना का पूर्ण होना पलामू और गढ़वा के लिए जीवनदायिनी साबित होगा। इसके पूरा होने से लाखों हेक्टेयर भूमि को पानी मिल सकेगा। पलामू के सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए यह योजना गेम-चेंजर साबित हो सकती है। पलामू के उन प्रखंडों में जहाँ नदियाँ नहीं हैं, वहाँ पाइपलाइन के जरिए सोन नदी का पानी पहुँचाने की योजनाओं में तेजी लाने की आवश्यकता है। बूढ़ा पहाड़ और अन्य छोटे जलप्रपातों का चैनलाइजेशन जरूरी है। पहाड़ों से आने वाले बारहमासी झरनों को छोटी नहरों के जरिए खेतों तक जोड़ना। जिस पर अभी तक कार्य नहीं किया जा सका है। सरकारी उदासीनता की अब तक कई योजनाएं भेंट चढ़ चुकी हैं। पलामू में ऐसी कई योजनाएं हैं जो फाइलों में दब गईं या रख-रखाव के अभाव में दम तोड़ चुकी हैं।
पलामू की पारंपरिक ‘आहार-पाइन’ व्यवस्था (पारंपरिक जल संचयन प्रणाली) सरकारी उपेक्षा और अतिक्रमण के कारण मृतप्राय हो गई है। कई प्रखंडों में स्थापित पंप हाउस और मशीनें जंग खा रही हैं। करोड़ों की लागत से बनी मशीनें बिना ऑपरेटर और बिजली के कबाड़ में तब्दील हो गई हैं।
कई जलाशयों में मिट्टी भर जाने के कारण अब ये अपनी पूरी क्षमता से सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं। सुदृढ़ सिंचाई
पलामू का किसान आज मजबूरन ईंट-भट्ठों या अन्य राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी के लिए पलायन कर रहा है। यदि सिंचाई की व्यवस्था पुख्ता हो जाए, तो कई परेशानियों से बचा जा सकता हैं। किसान केवल खरीफ (धान) पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि रबी और नकदी फसलों का उत्पादन कर सकेगा। जब यहां के खेत लहलहाएंगे, तो कृषि आधारित छोटे उद्योग (Food Processing) बढ़ेंगे। जब किसान अपने ही खेत में आत्म-निर्भर होगा, तो उसे अन्य दूरस्थ राज्यों में जाकर ठेकेदारों के शोषण का शिकार नहीं होना पड़ेगा। कहने का तत्पत साफ है कि
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पलामू को ‘सूखाग्रस्त’ के ठप्पे से बाहर निकालने के लिए केवल कागजी योजनाओं की नहीं, बल्कि जमीनी इच्छाशक्ति की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि बंद पड़ी लिफ्ट सिंचाई योजनाओं को तुरंत चालू करे और लंबित मेगा प्रोजेक्ट्स को समय सीमा के भीतर पूरा करे। जब तक पलामू के हर खेत तक पानी नहीं पहुँचेगा, तब तक यहाँ के विकास की बातें बेमानी हैं।
(लेखक संजय पांडेय झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)


