Palamu News : संसाधनों से समृद्ध पलामू , लेकिन रोजगार, जागरूकता और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में हर साल हजारों लोग छोड़ रहे अपना घर

मधुलता पाण्डेय विशेष संवाददाता । झारखंड का पलामू जिला प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है। यहां खनिज संसाधनों की उपलब्धता, विशाल वन क्षेत्र, कृषि योग्य भूमि और मेहनतकश मानव संसाधन किसी भी जिले के विकास की मजबूत नींव बन सकते हैं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। आज भी जिले के हजारों युवा और मजदूर हर वर्ष रोजगार की तलाश में पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यह केवल रोजगार का संकट नहीं, बल्कि विकास की उस असमान तस्वीर का प्रतीक है जिसमें संसाधन तो मौजूद हैं, लेकिन उनका लाभ स्थानीय लोगों तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। पलामू के गांवों में बेरोजगारी, अधूरी विकास योजनाएं, जागरूकता का अभाव और बिचौलियों का प्रभाव मिलकर ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जहां पलायन कई परिवारों की मजबूरी बन जाता है।
खनिज संपदा, लेकिन स्थानीय रोजगार का अभाव
पलामू में खनिज संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद बड़े उद्योगों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। स्थानीय स्तर पर ऐसे उद्योगों और प्रसंस्करण इकाइयों की संख्या सीमित है जो बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध करा सकें। परिणामस्वरूप पढ़े-लिखे युवा हों या अकुशल मजदूर दोनों को बेहतर आजीविका की तलाश में राज्य से बाहर जाना पड़ता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खनिज आधारित उद्योग, कृषि प्रसंस्करण इकाइयां, वन उत्पाद आधारित लघु उद्योग और कौशल विकास केंद्रों का व्यापक विस्तार किया जाए, तो जिले में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
बारिश पर निर्भर खेती, सालभर नहीं मिलता काम
पलामू की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है। लेकिन सिंचाई सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के कारण खेती का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा आधारित है। खरीफ फसल के बाद कई महीनों तक खेतों में काम नहीं रहता। ऐसे में परिवारों की आय रुक जाती है और मजदूरों के सामने पलायन के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचता।
ग्रामीण बताते हैं कि यदि सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार हो, जल संरक्षण पर प्रभावी काम हो और कृषि को लाभकारी बनाया जाए, तो बड़ी संख्या में लोग गांव में ही रोजगार पा सकते हैं।
योजनाएं हैं, लेकिन जानकारी नहीं. केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाएं स्वरोजगार, कौशल विकास, कृषि, पशुपालन, महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण आवास, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार से जुड़ी हैं। लेकिन दूर-दराज़ के गांवों में रहने वाले अनेक लोगों तक इन योजनाओं की जानकारी समय पर नहीं पहुंच पाती।
जागरूकता की कमी के कारण कई पात्र परिवार सरकारी लाभ से वंचित रह जाते हैं। ग्राम स्तर पर सूचना का प्रभावी प्रसार और नियमित जनजागरूकता अभियान आज भी एक बड़ी आवश्यकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार दिलाने के नाम पर बिचौलियों का प्रभाव लगातार देखा जाता है। ये एजेंट गांव-गांव जाकर बेहतर वेतन और सुविधाओं का वादा करते हैं और लोगों को दूसरे राज्यों में काम के लिए ले जाते हैं।
हालांकि कई श्रमिकों को रोजगार मिलता है, लेकिन कई मामलों में मजदूरी, कार्य परिस्थितियों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर शिकायतें भी सामने आती रही हैं। श्रमिक अधिकारों के जानकारों का कहना है कि पारदर्शी श्रम पंजीकरण, कानूनी भर्ती व्यवस्था और नियमित निगरानी से ऐसे जोखिम कम किए जा सकते हैं।
बुनियादी सुविधाओं का संकट
पलामू के अनेक गांव आज भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं, बेहतर शिक्षा, पेयजल, सड़क, इंटरनेट कनेक्टिविटी और सार्वजनिक परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन कमियों का सीधा असर आर्थिक विकास पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जहां सड़क और संचार व्यवस्था मजबूत होती है, वहां निवेश और रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ती हैं। इसलिए आधारभूत संरचना का विकास स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने की कुंजी है। महिलाओं और बच्चों पर असर पलायन का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है। परिवार के पुरुष सदस्यों के बाहर रहने से खेती, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। कई परिवारों में बच्चों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है, जबकि कुछ परिवार पूरे परिवार के साथ दूसरे राज्यों में चले जाते हैं, जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विकास विशेषज्ञों का मानना है कि पलामू की समस्या केवल रोजगार की नहीं, बल्कि समग्र विकास की है। यदि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग हो, कौशल विकास को बढ़ावा मिले, पर्यटन और कृषि आधारित उद्योग विकसित हों तथा युवाओं को उद्यमिता के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो जिले की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है।
सरकार की पहल और आगे की राह सरकार द्वारा मनरेगा, ग्रामीण विकास, कौशल प्रशिक्षण, स्वयं सहायता समूहों के सशक्तिकरण, सिंचाई योजनाओं और आजीविका मिशन जैसी कई पहलें संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित निगरानी और जनभागीदारी सुनिश्चित करना अब सबसे बड़ी चुनौती है।
स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, उद्योगों में निवेश, खनिज संसाधनों का संतुलित उपयोग, कृषि का आधुनिकीकरण, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं तथा योजनाओं की पारदर्शी पहुंचयही वे उपाय हैं जिनसे पलामू की तस्वीर बदली जा सकती है।

पलामू की विडंबना यह है कि जिस धरती के नीचे प्राकृतिक संपदा का विशाल भंडार है, उसी धरती के ऊपर रहने वाला आम नागरिक सम्मानजनक रोजगार की तलाश में अपना घर छोड़ने को विवश है।
यदि विकास की योजनाएं गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुंचें, स्थानीय संसाधनों से स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, बिचौलियों की भूमिका सीमित हो, जागरूकता बढ़े और बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों, तो पलामू केवल खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समावेशी विकास के मॉडल के रूप में भी अपनी पहचान बना सकता है।
आज आवश्यकता केवल संसाधनों के दोहन की नहीं, बल्कि उन संसाधनों का लाभ पलामू के लोगों तक पहुंचाने की है। जिस दिन यह लक्ष्य हासिल होगा, उस दिन पलायन मजबूरी नहीं, बल्कि विकल्प बनकर रह जाएगा।
(नोट : लेखिका आइडियल पत्रकर संगठन महिला विंग की झारखण्ड प्रदेश प्रभारी हैं )

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