निर्विवादित मस्जिद को विवादित ढांचा लिखने वाले जज को पद से हटाए सुप्रीम कोर्ट

The Supreme Court removed the judge who wrote the disputed structure to the undisputed mosque

शाहनवाज़ आलम

रोहित रंजन अग्रवाल की सांप्रदायिक टिप्पणी को पहले भी सुप्रीम कोर्ट फैसले से हटाने का निर्देश दे चुका है

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई पर रोक के बावजूद संभल की मस्जिद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट कैसे सुनवाई कर रहा है?

रिपोर्टर रोशन लाल

नई दिल्ली
कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरएसएस पक्ष के वकील की मांग पर संभल की जामा मस्जिद को ‘विवादित ढांचा’ लिखे जाने पर आपत्ति ज़ाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट से ‘विवादित’ शब्द हटाने का निर्देश देने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि भले मामला कोर्ट के अधीन है लेकिन जज अगर इस तरह सांप्रदायिक तत्वों के पक्ष काम करेंगे तो सेकुलर दलों और नागरिक समाज को इसका विरोध करना ही पड़ेगा।
शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को पूजा स्थल अधिनियम 1991 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई और पहले से चल रही याचिकाओं पर किसी भी तरह के आदेश देने पर रोक लगाई थी. ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट को ऐसा कोई आदेश देने का अधिकार ही नहीं है. यह साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है. जिसपर सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर जज के खिलाफ़ कार्यवाई करनी चाहिए।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि संभल के सिविल जज ने सर्वे का आदेश देते समय भी यह स्वीकार किया था कि पूर्व से भी मस्जिद के चरित्र पर कोई कैविएट लंबित नहीं है। बावजूद इसके उन्होंने गैर कानूनी तरीके से सर्वे का निर्देश दे दिया था. अब उसी तर्ज पर रोहित रंजन अग्रवाल भी निर्विवादित मस्जिद को ‘विवादित’ लिखकर भाजपा को भविष्य की सांप्रदायिक योजना के लिए मुद्दा दे रहे हैं।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि बाबरी मस्जिद मामले में भी शब्दों का यही खेल हुआ था. 80 के शुरूआत तक उसे मीडिया ‘बाबरी मस्जिद – राम जन्मभूमि विवाद’ कहती थी, फिर 80 से 89 तक सांप्रदायिक मीडिया उसे ‘राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद विवाद’ कहने लगी और उसके बाद आडवाणी ने उसे ‘विवादित ढांचा’ कहना शुरू किया तो मीडिया ने भी ‘विवादित ढाँचा’ कहना शुरू कर दिया. इस तरह बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए एक नैरिटिव तय्यार किया गया. संभल की जामा मस्जिद को भी अब कोर्ट ‘विवादित ढांचा’ कहकर मीडिया के माध्यम से उसके विध्वंस की पृष्ठभूमि तय्यार कर रहा है।
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि यह भी संज्ञान में रखा जाना चाहिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस जज रोहित रंजन अग्रवाल ने निर्विवादित मस्जिद को ‘विवादित ढांचा’ लिखा है वह ख़ुद सांप्रदायिक द्वेष से ग्रसित रहे हैं. जिन्होंने एक ईसाई व्यक्ति की जमानत याचिका रद्द करते हुए सांप्रदायिक टिप्पणी की थी. जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ़ जमानत दी बल्कि धर्मांतरण को लेकर की गयी उनकी सांप्रदायिक टिप्पणी को फैसले से हटाने का भी निर्देश दिया था. शाहनवाज़ आलम ने कहा कि रोहित रंजन अग्रवाल की सांप्रदायिक मानसिकता को देखते हुए तो उन्हें पद से ही हटा देना चाहिए था लेकिन आश्चर्य की बात है कि वो अभी भी पद पर बने हुए हैं और उन्हें सुनवाई के लिए संवेदनशील मुकदमा भी दिया जा रहा है
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि ऐसा लगता है कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना पूजा स्थल अधिनियम को कमज़ोर करने की कोशिशों के आगे नहीं झुके इसलिए मई में उनके रिटायर होने के बाद आने वाले मुख्य न्यायाधीश पर दबाव बनाने के लिए इस तरह की हरकतें सरकार द्वारा सांप्रदायिक जजों से करवाई जा रही हैं।

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