जब प्रशासन ‘एक्शन मोड’ में होगा, तभी पलामू के खेतों में पानी पहुंचेगा थानों में न्याय मिलेगा

Only when the administration is in 'action mode' will water reach the fields of Palamu and justice will be provided in the police stations.

मधुलता:
नीलांबर-पीतांबर की यह धरती आज एक ऐसे नेतृत्व की राह देख रही है जो फाइलों के अंबार से बाहर निकलकर पलामू की धूल भरी सड़कों और सुदूरवर्ती गांवों की समस्याओं को अपनी आंखों से देख सके। पलामू की जनता को आज ऐसे पुलिस अधीक्षक (SP) और जिला दंडाधिकारी (DC) की आवश्यकता है, जिनका इकबाल न केवल अपराधियों में खौफ पैदा करे, बल्कि आम आदमी के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास जगाए। ​पलामू जैसे जिले में, जहाँ प्रखंड मुख्यालयों से जिला मुख्यालय की दूरी काफी अधिक है, वहाँ एक गरीब किसान या मजदूर के लिए बार-बार समाहरणालय के चक्कर काटना संभव नहीं है। ​प्रशासनिक चौपाल: जिले को ऐसे डीसी की जरूरत है जो ‘सरकार आपके द्वार’ जैसे कार्यक्रमों को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर उतारें। हर प्रखंड में नियमित अंतराल पर ‘जन समस्या निवारण शिविर’ लगने चाहिए जहाँ आवेदन लेने के साथ-साथ उनका तत्काल निष्पादन हो। ​त्वरित निर्णय शक्ति: भूमि विवाद और दाखिल-खारिज (Mutation) जैसे मामलों में पलामू में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। ऐसे में एक ‘एक्शन मोड’ वाले अधिकारी की जरूरत है जो बिचौलियों के तंत्र को ध्वस्त कर सके। ​अपराध नियंत्रण और पुलिसिंग: केवल गश्त नहीं, प्रभावी कार्रवाई​एक आदर्श एसपी वह है जिसकी मौजूदगी का अहसास थानों के कामकाज में दिखे। अक्सर देखा जाता है कि थानों में गरीब फरियादियों की बात नहीं सुनी जाती। पलामू को ऐसे एसपी की जरूरत है जो ‘सरप्राइज विजिट’ के जरिए थानों की कार्यशैली सुधारे। नशे और अवैध खनन पर प्रहार: पलामू में बढ़ता नशा और बालू-पत्थर का अवैध उत्खनन जिले की अर्थव्यवस्था और युवाओं के भविष्य को खोखला कर रहा है। ‘एक्शन मोड’ एसपी को इन माफियाओं के सिंडिकेट को तोड़ना होगा। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यानी पत्रकार, समाज का आइना होते हैं। पलामू के विकास में पत्रकारों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
​नियमित ब्रीफिंग: प्रशासन को पत्रकारों के साथ केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सार्थक संवाद करना चाहिए। जिले की सच्चाई, अपराध के आंकड़े और विकास योजनाओं की प्रगति पर नियमित प्रेस वार्ताएं होनी चाहिए ताकि अफवाहों पर लगाम लगे और सही सूचना जनता तक पहुंचे। ​खोजी पत्रकारिता को सम्मान: जब पत्रकार किसी गड़बड़ी को उजागर करें, तो प्रशासन उसे चुनौती के रूप में लेने के बजाय सुधार के अवसर के रूप में देखे। ​पलामू हमेशा से सूखे की मार झेलता रहा है। यहाँ के लिए ‘एक्शन’ का मतलब केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचा भी है। ​सिंचाई परियोजनाएं: मंडल डैम (उत्तरी कोयल परियोजना) जैसी योजनाएं दशकों से लंबित हैं। एक सक्रिय डीसी को राज्य और केंद्र के बीच समन्वय बनाकर इन योजनाओं को गति देनी होगी। ​शिक्षा और स्वास्थ्य: मेदिनीनगर के एमएमसीएच (MMCH) की स्थिति और प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर सीधी निगरानी की जरूरत है। पलामू में भ्रष्टाचार एक दीमक की तरह है। चाहे वह आवास योजना हो या राशन कार्ड, हर जगह कमीशनखोरी की शिकायतें आम हैं। ​डिजिटल पारदर्शिता: सभी सरकारी सेवाओं को पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी बनाना। ​कठोर दंडात्मक कार्रवाई: गड़बड़ी करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों पर ‘ऑन द स्पॉट’ सस्पेंशन और कानूनी कार्रवाई का साहस दिखाने वाला नेतृत्व चाहिए. ​पलामू एक संवेदनशील जिला है। यहाँ सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक न्याय बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। युवाओं को अपराध और उग्रवाद की राह से भटकाने के लिए खेल और कौशल विकास के कार्यक्रमों पर जोर देना। पलामू को आज ऐसे अधिकारियों की जोड़ी (DC-SP) चाहिए जो सुबह की चाय के साथ जिले की कानून-व्यवस्था की समीक्षा करें और शाम को किसी सुदूर गांव में चौपाल लगाकर जनता के आंसू पोंछ सकें। जनता को ‘रबड़ स्टैंप’ अधिकारी नहीं, बल्कि ‘डिसीजन मेकर’ चाहिए। जब प्रशासन ‘एक्शन मोड’ में होगा, तभी पलामू के खेतों में पानी पहुंचेगा, थानों में न्याय मिलेगा और पत्रकार निर्भीकता से जिले की प्रगति की कहानी लिख सकेंगे।

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