ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं व समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र लगातार अपना खो रहे हैं रासायनिक संतुलन
Glaciers are retreating and marine ecosystems are steadily losing their chemical balance.

संजय पांडेय: दुनिया के सबसे संरक्षित परिदृश्यों में एक शांत विडंबना उभर रही है। वे स्थान जो मानवता की संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक थे, अब अपनी सीमाओं के साक्ष्य के रूप में सामने आ रहे हैं। एक हालिया वैश्विक मूल्यांकन से पता चला है कि यूनेस्को (UNESCO) द्वारा नामित लगभग 90 प्रतिशत स्थल महत्वपूर्ण पर्यावरणीय तनाव में हैं। यह खोज न केवल चिंताजनक है, बल्कि शिक्षाप्रद भी है। ऐसा लगता है कि ‘सुरक्षा’ (Protection) अब पर्याप्त सुरक्षा नहीं रह गई है।
दशकों से, यूनेस्को-टैग वाले इन स्थलों जैव विविधता से भरपूर जंगलों से लेकर सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण परिदृश्यों तक को संरक्षण का स्वर्ण मानक माना जाता रहा है। 13 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले इन स्थानों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे तीव्र औद्योगीकरण और पारिस्थितिक गिरावट के दबावों से मुक्त रहेंगे। फिर भी, वास्तविकता अब उस धारणा को चुनौती दे रही है। विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन एक सर्वव्यापी शक्ति बन गया है, जो इनमें से 98 प्रतिशत स्थलों को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहा है।
खतरे की प्रकृति विशेष रूप से विचलित करने वाली है। यह अब वनों की कटाई या प्रदूषण जैसी स्थानीय मानवीय गतिविधियों तक सीमित नहीं है बल्कि प्रणालीगत, वैश्विक बदलावों से प्रेरित है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, महासागरीय अम्लीकरण और चरम मौसम की घटनाएं पारिस्थितिक तंत्र को उस गति और पैमाने पर बदल रही हैं, जिसे संभालने के लिए पारंपरिक संरक्षण ढांचे कभी नहीं बनाए गए थे।
बदलते पारिस्थितिकी तंत्र और खतरे: ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र लगातार अपना रासायनिक संतुलन खो रहे हैं। ये अलग-थलग व्यवधान नहीं हैं; ये संरचनात्मक बदलाव हैं।
जंगल की आग: शायद इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेतक वनाग्नि की बढ़ती भूमिका है। वर्ष 2000 के बाद से 300,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक का वन क्षेत्र नष्ट हो चुका है।
आक्रामक प्रजातियां: आक्रामक प्रजातियां चुपचाप पारिस्थितिक संतुलन बदल रही हैं और अब 80 प्रतिशत से अधिक स्थलों में मौजूद हैं।
मानवीय दबाव: वनों के बीच से कटती सड़कें, क्षमता से अधिक पर्यटन और संसाधनों का निष्कर्षण सामूहिक प्रभाव डाल रहे हैं जिसे अनदेखा करना कठिन है।
रिपोर्ट की चेतावनी कि इनमें से एक चौथाई से अधिक स्थल 2050 तक ‘टिपिंग पॉइंट’ (अंतिम सीमा) पर पहुँच सकते हैं, गंभीर ध्यान देने की मांग करती है। ये केवल सैद्धांतिक सीमाएँ नहीं हैं; ये वे क्षण हैं जिनके बाद पारिस्थितिकी तंत्र अपनी मूल स्थिति में वापस नहीं लौट सकते।
समाधान का मार्ग: भागीदारी और अनुकूलन: इतने दबाव के बावजूद, यूनेस्को स्थल अपने आसपास के क्षेत्रों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले दशकों में इन क्षेत्रों में आवास क्षरण काफी कम रहा है। यह दर्शाता है कि संरक्षण के प्रयास काम तो करते हैं लेकिन केवल एक बिंदु तक। वे गिरावट को धीमा करते हैं; वे जोखिम को खत्म नहीं करते। पारंपरिक मॉडल सीमांकन करना, रक्षा करना और विनियमित करना अब अपर्याप्त साबित हो रहा है। इसके बजाय जो आवश्यक है वह एक ‘अनुकूलन दृष्टिकोण’ (adaptive approach) है, जो संरक्षण को जलवायु लचीलेपन, स्थानीय आजीविका और दीर्घकालिक स्थिरता के साथ एकीकृत करता है। बताते चलें कि 90 करोड़ (900 million) लोग अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन परिदृश्यों पर निर्भर हैं। जब ये पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होते हैं, तो प्रभाव केवल जैव विविधता तक सीमित नहीं रहता यह खाद्य सुरक्षा, आय स्थिरता और सामाजिक लचीलेपन तक फैल जाता है। इन स्थलों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया केवल प्रतीकात्मक प्रतिबद्धताओं के साथ नहीं, बल्कि निरंतर, अनुकूलन योग्य और समावेशी रणनीतियों के साथ कैसे प्रतिक्रिया देती है। इन स्थानों की रक्षा करके, दुनिया केवल विरासत का संरक्षण नहीं कर रही है; वह उन आधारों की रक्षा कर रही है जिन पर मानव अस्तित्व टिका है। दुनिया के सबसे बेशकीमती खजाने केवल विरासत के निशान नहीं हैं वे जीवित प्रणालियाँ हैं। उनका अस्तित्व इस पर निर्भर नहीं करेगा कि उन्हें कितनी अच्छी तरह ‘शील्ड’ (घेरा) दिया गया है, बल्कि इस पर निर्भर करेगा कि उन्हें कितनी समझदारी से बनाए रखा गया है।
(लेखक, झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विश्लेषक हैं)



