Azamgarh news :धरती माता बचाओ अभियान के तहत नैनो उर्वरकों के महत्व एवं उपयोग पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम का हुआ आयोजन
धरती माता बचाओ अभियान के तहत नैनो उर्वरकों के महत्व एवं उपयोग पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम का हुआ आयोजन

आजमगढ़ ब्यूरो चीफ राकेश श्रीवास्तव
धरती माता बचाओ अभियान/उर्वरक निगरानी समिति अभियान के तहत नैनो उर्वरकों के महत्व एवं उपयोग आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कृषि विभाग के अधिकारी गणों हेतु कृषि भवन सभागार, सिधारी जनपद आजमगढ़ में किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संयुक्त कृषि निदेशक आजमगढ़ मंडल आजमगढ़ श्री आशीष कुमार, जिला कृषि अधिकारी डॉक्टर गगनदीप सिंह, इफको मुख्य क्षेत्रीय प्रबंधक गोरखपुर डॉक्टर विनोद कुमार सिंह,
कार्यक्रम में डॉ. आर.के नायक वरिष्ठ मृदा वैज्ञानिक के.वी.के, डॉ. शैलेंद्र कुमार मिश्रा वैज्ञानिक फसल सुरक्षा के.वी के, श्री हरिकेश मालवीय (STA, कृषि विभाग), कृषि सलाहकार डॉ. रामकेवल यादव,
डॉ अभिमन्यु यादव A D S T कृषि विभाग, डॉ मुलायम यादव शोध कार्यालय आजमगढ़,क्षेत्र प्रबंधक, इफको आजमगढ़ श्री जियाउद्दीन सिद्दीकी, श्री मुरली मनोहर सिंह सचिव डी.सी.एफ. सहित जनपद के समस्त विकास खंडों के ए.डी.ओ. A G एवं एडीओ P P, शुभम सिंह S.F.A इफको सहित 100 के संख्या में केंद्र प्रभारी ने भाग लिया।
संयुक्त कृषि निदेशक, आजमगढ़ मंडल आजमगढ़, द्वारा बताया गया की किसानों के द्वारा फसल में सिफारिश की मात्रा से अधिक उर्वरकों का प्रयोग किया जा रहा है इससे लागत बढ़ रही है और मृदा का स्वास्थ्य खराब हो रहा है सामान्य उर्वरकों के स्थान पर नैनो उर्वरकों के प्रयोग से किसानों की लागत घटेगी, उत्पादकता में वृद्धि होगी साथ ही फसल का उत्पाद उत्तम क्वालिटी से प्राप्त होंगे। नैनो उर्वरक सामान्य उर्वरक का अच्छा विकल्प है। इससे कीट, बीमारी,खरपतवार भी नियंत्रित रहेंगे तथा उत्पादन लागत में भी कमी आएगी।
डॉ विनोद कुमार सिंह इफको गोरखपुर ने बताया कि किसानों को बिना मिट्टी की जांच कराए खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार फसलों के लिए उर्वरकों का आदर्श अनुपात नाइट्रोजन : फास्फोरस : पोटाश = 4 : 2 : 1 होना चाहिए।लेकिन वर्तमान समय में यह संतुलन बिगड़कर 30 : 7.95 : 1 के खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि किसान आवश्यकता से लगभग दोगुना यूरिया खेतों में डाल रहे हैं, जिससे मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन तेजी से घट रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो भविष्य में जमीन की उर्वरता खत्म होकर वह बंजर हो सकती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट बनेगा।
पारंपरिक पद्धति में किसान यूरिया और डीएपी की बोरियां सीधे खेतों में डाल देते हैं, लेकिन उसमें से केवल 30–40% पोषक तत्व ही पौधों को मिल पाते हैं, जबकि बाकी हिस्सा मिट्टी, पानी और पर्यावरण को प्रदूषित कर देता है।
इसके विपरीत, यदि किसान नैनो उर्वरक और जल विलेय उर्वरकों का उपयोग करें, तो पौधों को लगभग 85% तक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है, लागत कम होती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
जिला कृषि अधिकारी महोदय द्वारा बताया गया कि मिट्टी की खोई हुई उर्वरता को पुनः प्राप्त करने के लिए ढैंचा या सनई जैसी हरी खाद किसी संजीवनी से कम नहीं है। धान की रोपाई से पहले यदि खेत में ढैंचा उगाकर उसे उसी खेत में जोत दिया जाए, तो यह मिट्टी को प्राकृतिक रूप से सशक्त बनाता है।
ढैंचा की जड़ें वायुमंडल से नाइट्रोजन को खींचकर मिट्टी में संग्रहित करती हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। यदि किसान समय पर हरी खाद का उपयोग करें, तो रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता लगभग 50% तक कम की जा सकती है। यह विधि न केवल कम खर्चीली है, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी अत्यंत सहायक है।
इसलिए किसानों को चाहिए कि वे अधिक से अधिक जैविक एवं हरी खादों का उपयोग करें, ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।
साथ ही, किसानों के लिए फार्मर आईडी एक महत्वपूर्ण डिजिटल पहचान के रूप में विकसित की जा रही है। यह आधार कार्ड की तरह एक 12 अंकों का विशेष पहचान नंबर होता है, जो सरकार के डिजिटल कृषि मिशन का हिस्सा है।
इस आईडी में किसान की व्यक्तिगत जानकारी के साथ-साथ उसकी भूमि का विवरण, बैंक खाता और आधार नंबर लिंक होता है। अब इसी फार्मर आईडी के माध्यम से रासायनिक खाद का वितरण भी किया जाएगा, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और सही किसानों तक लाभ पहुंचेगा।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ रणधीर नायक द्वारा मृदा पर्यावरण एवं जल प्रदूषण रोकने के लिए संतुलित उर्वरक प्रयोग पर बल दिया गया तथा जैविक खेती के संबंध में जानकारी दी गई।
क्षेत्र प्रबंधक इफको द्वारा अपने संबोधन में उन्होंने बताया कि नैनो डीएपी एवं नैनो यूरिया प्लस के प्रयोग से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व संतुलित रूप से प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है और लागत में भी कमी आती है।
उन्होंने किसानों को बीज एवं जड़ शोधन की विधि, फसलों पर सही तरीके से छिड़काव करने की तकनीक, तथा धान सहित विभिन्न फसलों में नैनो उर्वरकों के प्रभावी उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी दी। साथ ही यह भी बताया कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से नैनो उर्वरकों का प्रयोग करें, तो कम मात्रा में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है और मृदा स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है।



