Palamu News: जल संकट कोई दैवीय आपदा नहीं, कुप्रबंधन व दूरदर्शिता की कमी का परिणाम है

​पलामू की प्यास: चुनावी मुद्दा या स्थायी समाधान की प्रतीक्षा?

​पत्रकार मधुलता पांडेय की कलम से
​पलामू की धरती पर जब सूरज अपनी तपिश बढ़ाता है और जलस्तर पाताल की ओर भागने लगता है, तब सत्ता के गलियारों में हलचल शुरू होती है। जैसे ही कोयल, अमानत और सोन की सहायक नदियाँ सूखती हैं, प्रशासन की फाइलों में ‘वाटर प्लानिंग’ के पन्ने पलटने लगते हैं। मंत्रियों के दौरे होते हैं, बैठकों का दौर चलता है और आश्वासनों की बौछार होती है। लेकिन विडंबना देखिए, जैसे ही मानसून की पहली फुहार पड़ती है, सारी सक्रियता और योजनाएं ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। ​पलामू के लिए जल संकट कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि कुप्रबंधन और दूरदर्शिता की कमी का परिणाम है। मौसमी सक्रियता का रोग ​पलामू में जल संकट के प्रति शासन और प्रशासन का रवैया हमेशा ‘आग लगने पर कुआं खोदने’ जैसा रहा है।
​ गर्मी में टैंकरों से पानी बांटना या चापाकल मरम्मत करना केवल एक ‘बैंड-एड’ समाधान है। जैसे ही बारिश होती है, जल संरक्षण के ढांचे (जैसे चेक डैम, तालाबों का जीर्णोद्धार) की सुध लेना बंद कर दिया जाता है। जबकि बारिश का समय ही वह वक्त है जब भविष्य के लिए पानी संचित किया जाना चाहिए।
​अगर प्रशासन वास्तव में गंभीर है, तो उसे संकट आने का इंतजार करने के बजाय निम्नलिखित कदम युद्ध स्तर पर उठाने चाहिए:
​जल स्रोतों का डिजिटलीकरण हो। पलामू के हर गांव में मौजूद कुओं, तालाबों और बोरवेल की वास्तविक स्थिति का एक डिजिटल डेटाबेस हो, ताकि संकट आने से पहले ही बैकअप तैयार रहे।
​मोबाइल रिपेयरिंग यूनिट स्थापित हो। गर्मी शुरू होने से तीन महीने पहले ही पंचायत स्तर पर चापाकल मरम्मत की टीमें सक्रिय होनी चाहिए।
​अतिक्रमण मुक्त जलाशय: शहरों और गांवों के पुराने तालाबों पर हुए अवैध कब्जों को मानसून से पहले हटाना अनिवार्य है ताकि जल भराव क्षमता बनी रहे। दीर्घकालिक योजनाएं पर कार्य शुरू हो। पलामू को ‘डार्क जोन’ से निकालने का रोडमैप
​पलामू की पथरीली जमीन को स्थायी राहत केवल बड़ी और ठोस योजनाओं से ही मिल सकती है: ​कनहर-सोन पाइपलाइन परियोजना को हर हाल में अमलीजामा पहनना पड़ेगा। पलामू के लिए लाइफलाइन मानी जाने वाली पाइपलाइन सिंचाई परियोजनाओं को समय सीमा के भीतर पूरा करना। नदियों के अधिशेष (Surplus) पानी को लिफ्ट कर जलाशयों तक पहुँचाना ही एकमात्र विकल्प है।
​चेक डैम का जाल बिछाना होगा। छोटी नदियों और नालों पर श्रृंखला बद्ध (Chain) चेक डैम का निर्माण करना। इससे न केवल सतही जल उपलब्ध होगा, बल्कि भू-गर्भ जल (Groundwater) का स्तर भी ऊपर आएगा।
​रेन वाटर हार्वेस्टिंग की शहरी क्षेत्रों में नए भवनों के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों में वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाकर उसे कड़ाई से लागू करना।
​परंपरागत जल निकायों का पुनरुद्धार जरूरी है। पलामू के पुराने ‘आहर-पईन’ सिस्टम को आधुनिक इंजीनियरिंग के साथ पुनर्जीवित करना।
​पलामू की प्यास बुझाने के लिए फाइलों की रफ्तार को मौसम के मिजाज से मुक्त करना होगा। मंत्री और प्रशासन को समझना होगा कि जल प्रबंधन एक बारहमासी जिम्मेदारी है, न कि केवल ग्रीष्मकालीन इवेंट। जब तक हम बरसात के पानी की एक-एक बूंद को सहेजने की दीर्घकालिक नीति पर काम नहीं करेंगे, पलामू की धरती हर साल ‘हाहाकार’ और ‘ठंडे बस्ते’ के इसी दुष्चक्र में फंसी रहेगी। अब वक्त आश्वासनों का नहीं, धरातल पर बहते पानी को रोकने का है।
​नोट: यह आलेख पलामू की वर्तमान परिस्थितियों और प्रशासनिक रवैये पर एक विश्लेषणात्मक दृष्टि डालता है।

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