Jharkhand News: पलामू की धरती प्यासी है जहां पीने का पानी में फ्लोराइड की मात्रा है अधिक, परिणाम है विकलांग होता बचपन

Jharkhand news: Palamu is thirsty, with high fluoride levels in drinking water, resulting in disabled children.

✍️ संजय पांडेय की कलम से:
पलामू की माटी पानी के लिए तरसती रही है, यह इतिहास है। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि जो पानी मिल रहा है, वह जिंदगी नहीं,

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मौत और लाचारी बांट रहा है। चाहे सुदूर मनातू-पाटन के गांव हों या जिला मुख्यालय मेदिनीनगर का अनुमंडल क्षेत्र, जब तक हर घर तक शुद्ध जल की धार नहीं पहुंचती, तब तक विकास के सारे दावे बेमानी हैं। झारखंड राज्य के पलामू के कई क्षेत्र में लोगों पानी नहीं, बीमारी पी रहे हैं। ​झारखंड का पलामू जिला दशकों से सुखाड़ और जल संकट के लिए सुर्खियों में रहा है।

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लेकिन आज यहां की सबसे बड़ी ट्रेडिजी सिर्फ पानी की किल्लत नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी का ‘जहरीला’ होना है। पलामू के एक बड़े हिस्से में लोग जो पानी पी रहे हैं, वह देखने में भले ही साफ लगे, लेकिन उसमें घुला फ्लोराइड लोगों की हड्डियों को खोखला और भविष्य को अपंग बना रहा है। सरकारी वादों और पाइपलाइन योजनाओं के दावों के बीच, धरातल पर स्थिति यह है कि हज़ारों लोग फ्लोरोसिस (नाम की गंभीर बीमारी की चपेट में हैं। ​धरातल की हकीकत यह है कि आंकड़े और प्रभावित क्षेत्र
​पलामू जिले के चैनपुर, पाटन, लेस्लीगंज, उंटारी रोड, विश्रामपुर, मनातू और सतबरवा जैसे प्रखंडों के दर्जनों गांवों में फ्लोराइड की मात्रा तय मानक से कई गुना अधिक है। अब सवाल है

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कि इसकी मानक क्या है और हकीकत क्या है? विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार, पीने के पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित मात्रा 1.0 mg/L (मिलीग्राम प्रति लीटर) होनी चाहिए, और किसी भी हाल में यह 1.5 mg/L से अधिक नहीं होनी चाहिए। लेकिन पलामू के कई प्रभावित गांवों के चापाकालों और कुओं में यह मात्रा 3.0 mg/L से लेकर 7.5 mg/L तक पाई गई है। पलामू जिला मुख्यालय
​मेदिनीनगर अनुमंडल की स्थिति और भी चिंताजनक है।
​आमतौर पर यह माना जाता है कि फ्लोराइड का संकट केवल सुदूर ग्रामीण इलाकों में है, लेकिन जिला मुख्यालय को समेटे मेदिनीनगर अनुमंडल क्षेत्र की स्थिति भी बेहद चिंताजनक हो चुकी है।
मेदिनीनगर अनुमंडल के अंतर्गत आने वाले मेदिनीनगर शहर के आस-पास के इलाके, शाहपुर, सुआ, रजवाडीह और चियांकी जैसे क्षेत्रों के भूगर्भ जल में भी फ्लोराइड की मौजूदगी पाई गई है।

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​बढ़ती आबादी और अंधाधुंध बोरिंग: मेदिनीनगर अनुमंडल क्षेत्र में तेजी से होते शहरीकरण के कारण पानी की मांग बढ़ी है। इसके चलते सैकड़ों फीट गहरे कमर्शियल और घरेलू बोरिंग किए जा रहे हैं। नतीजा यह है कि वाटर टेबल नीचे जा रहा है और अब शहरी क्षेत्र के मुहाने पर बसे लोग भी अनजाने में फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं।
​सदर प्रखंड के ग्रामीण इलाके: अनुमंडल के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट के कारण लोग पूरी तरह सरकारी चापाकालों पर निर्भर हैं, जिनमें से कई चापाकाल फ्लोराइड की अधिकता के कारण ‘रेड मार्क’ (लाल रंग) किए जा चुके हैं, फिर भी विकल्पों के अभाव में लोग इन्हीं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

बात व्यक्ति नहीं, नीति की ; सभ्यता नहीं, सिस्टम की!

पानी मैं फ्लोराइड की मात्रा अधिक पाये जाने से ​स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। परिणाम यह है असमय बुढ़ापा और टेढ़ी होती हड्डियां हैं। जिसे चुकरु गाँव में जाकर देखा जा सकता है। कई व्यक्ति घिसट घिसट कर मौत के मुंह में समा गए।
​पलामू के प्रभावित गांवों का दौरा करने पर 30-35 साल के युवा भी 60 साल के बुजुर्ग की तरह लाठी टेककर चलते हुए मिल जाएंगे। फ्लोराइड का यह धीमा जहर दो तरह से आबादी को लील रहा है:
​डेंटल फ्लोरोसिस : बच्चों के दांत पीले, कत्थई और काले होकर टूटने लगते हैं। यह इस बीमारी का शुरुआती लक्षण है, जो पलामू के स्कूली बच्चों में आम तौर पर देखा जा सकता है।
​स्केलेटल फ्लोरोसिस : यह अधिक खतरनाक है। लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से यह हड्डियों में जमा होने लगता है। इसके कारण पीठ, घुटनों और जोड़ों में असहनीय दर्द होता है। धीरे-धीरे रीढ़ की हड्डी अकड़ जाती है और लोग कूबड़ का शिकार हो जाते हैं। पैर धनुष की तरह टेढ़े हो जाते हैं।
​सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि फ्लोरोसिस का कोई इलाज नहीं है। एक बार जब हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं, तो उन्हें दवाइयों से ठीक नहीं किया जा सकता। इसे केवल शुद्ध पानी पीकर बढ़ने से रोका जा सकता है।

​ससवाल है को आखिर क्यों ज़हरीला हो रहा है पलामू का पानी?

​इस संकट के पीछे प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों कारण जिम्मेदार हैं:
​भूगर्भीय संरचना पलामू की धरती के नीचे ग्रेनाइट और नीस जैसी चट्टानें हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है।
​जल स्तर का लगातार गिरना: पलामू में हर साल जल स्तर नीचे जा रहा है। जैसे-जैसे पानी गहरे बोरिंग के सहारे नीचे से खींचा जा रहा है, पानी में खनिजों और फ्लोराइड का सांद्रण बढ़ता जा रहा है।
​ प्रभावित गांवों और मेदिनीनगर अनुमंडल के सीमावर्ती क्षेत्रों में जब चापाकाल फ्लोराइड उगलते हैं, तो प्रशासन उन्हें ‘लाल रंग’ से चिह्नित तो कर देता है, लेकिन ग्रामीणों के पास पीने के पानी का कोई दूसरा साधन नहीं होता। मजबूरी में वे उसी ‘लाल’ चापाकाल का जहर पीने को विवश हैं।

​सरकार और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की ओर से दावों की कोई कमी नहीं है। ‘जल जीवन मिशन’ के तहत हर घर नल से जल पहुंचाने की योजनाएं चल रही हैं। सोन नदी, कोयल नदी और कन्हाड़ नदी से पाइपलाइन के जरिए शुद्ध सतही जल लाने की करोड़ों की योजनाएं स्वीकृत हैं। ​लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती है:
​फ्लोराइड रिमूवल प्लांट की नाकामी: कुछ साल पहले प्रभावित गांवों के चापाकालों में जो फ्लोराइड फिल्टर लगाए गए थे, वे उचित रखरखाव और मेंटेनेंस के अभाव में कबाड़ बन चुके हैं।

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​ मेदिनीनगर अनुमंडल सहित पूरे जिले में पाइपलाइन बिछाने और जल शोधन संयंत्र बनाने का काम कछुआ गति से चल रहा है। कई जगहों पर पाइपलाइन तो बिछ गई है, लेकिन महीनों से उसमें पानी की एक बूंद नहीं टपकी है।
​निष्कर्ष और समाधान: अब बातें नहीं, कड़े कदम उठाने होंगे ​पलामू में फ्लोराइड की समस्या केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। स्वच्छ पेयजल पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि पलामू और मेदिनीनगर अनुमंडल की आने वाली पीढ़ी को अपंग होने से बचाना है, तो निम्नलिखित कदम तुरंत उठाने होंगे:
​सतही जल पर पूर्ण निर्भरता: भूगर्भ जल पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना होगा। कोयल और अन्य प्रमुख नदियों के पानी को शुद्ध कर शहरी और ग्रामीण इलाकों के हर घर तक युद्ध स्तर पर पहुंचाना होगा।
​सख्त मॉनिटरिंग: जो वाटर फिल्टर या ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जा रहे हैं, उनकी जियो-टैगिंग और साप्ताहिक मेंटेनेंस ऑडिट होनी चाहिए।
​जागरूकता और पोषण: ग्रामीणों को बताना होगा कि फ्लोराइड युक्त पानी का असर कम करने के लिए उन्हें कैल्शियम, विटामिन-सी और आयरन से भरपूर भोजन (जैसे महुआ, सहजन/मुनगा, आंवला) का चयन करना चाहिए।

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