यूपी पंचायत चुनाव पर कानूनी संकट, कोर्ट ने तय की अगली सुनवाई
Legal crisis over UP Panchayat elections, court fixes next hearing

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की तारीख को लेकर उठे विवाद ने अब कानूनी रूप ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है।मामला त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से जुड़ा है, जिसके तहत ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य के पदों पर चुनाव होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा ध्यान ग्राम प्रधान के चुनाव पर रहता है, जिनकी संख्या 50 हजार से अधिक होती है, इसलिए इसे राज्य का सबसे बड़ा चुनावी अभ्यास माना जाता है।याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी कराई जाए।संविधान के अनुसार, किसी भी ग्राम पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से अधिकतम पांच साल तक ही होता है। इस अवधि के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है, अन्यथा प्रशासनिक व्यवस्था के तहत प्रशासक नियुक्त करने पड़ते हैं।सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा कि क्या वह संवैधानिक समयसीमा के भीतर चुनाव संपन्न करा पाएगा।अदालत ने विशेष रूप से 19 फरवरी की अधिसूचना का हवाला देते हुए यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या 26 मई तक या उससे पहले चुनाव पूरे हो सकते हैं।चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह आरक्षण प्रक्रिया को बताया जा रहा है। पंचायत चुनाव में सीटों का आरक्षण तय करने के लिए ओबीसी आयोग की भूमिका अहम होती है।आयोग जिला-वार समीक्षा के बाद अपनी सिफारिशें देता है, जिसमें आमतौर पर 2–3 महीने का समय लगता है। लेकिन पूर्व आयोग का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए आयोग के गठन में देरी से पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत में कहा गया कि उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1947 के तहत चुनाव की तारीख तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, जो आयोग की सलाह के आधार पर अधिसूचना जारी करती है।सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की है।



