आजमगढ़ में फर्जी दस्तावेजों के सहारे जमीन विवाद में खेल? पीड़ित ने खोली तहसील की कार्यप्रणाली की पोल,तहसील प्रशासन घिरा

ADM कोर्ट में गलत रिपोर्ट पेश करने का आरोप, जांच की मांग तेज

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो कार्रवाई किस पर होगी- गलत रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारी पर या फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले पक्ष पर? कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर फर्जी दस्तावेज, कूटरचित आदेश या झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करता है, तो उसके खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और न्यायालय को गुमराह करने जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज हो सकता है। वहीं, यदि किसी अधिकारी द्वारा तथ्यों की अनदेखी कर या मिलीभगत के तहत गलत रिपोर्ट लगाई गई है, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच के साथ-साथ भ्रष्टाचार और कर्तव्य में लापरवाही के आरोपों में भी कार्रवाई संभव है।

आजमगढ़ जिले की निजामाबाद तहसील क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत आवंक से एक बेहद गंभीर और चर्चित मामला सामने आया है, जहां भ्रष्टाचार और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर गलत रिपोर्ट लगाए जाने के आरोपों ने तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि नायब तहसीलदार ने बार-बार अवगत कराने के बावजूद निष्पक्ष जांच नहीं की और फर्जी साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट लगाकर एक पक्ष को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया।

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मामला ग्राम पंचायत आवंक निवासी मोहम्मद राशिद पुत्र हकीमुद्दीन से जुड़ा हुआ है। बताया जा रहा है कि उनके पुश्तैनी मकान पर वर्षों से घरौनी दर्ज थी और सरकार द्वारा भी उन्हें आवासीय लाभ दिया गया था। आरोप है कि गांव के ही एजाज और फैयाज पुत्र जैहीरुद्दीन ने पोखरी की भूमि पर अपना दो मंजिला पक्का मकान बना लिया और अब मोहम्मद राशिद की घरौनी को हटवाकर अपने मकान को वैध साबित कराने की कोशिश कर रहे हैं।

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पीड़ित पक्ष के अनुसार, एजाज और फैयाज ने मुकदमा संख्या 1061 के आदेश को अपना बताते हुए फर्जी दस्तावेज नायब तहसीलदार को सौंप दिए। जबकि वास्तविक मुकदमा “आबू ताल्हा पुत्र अइनुलहक बनाम ग्राम पंचायत” से संबंधित बताया जा रहा है, जिसका आदेश वर्ष 2009 में हुआ था। पीड़ितों का कहना है कि जब इस आदेश और अभिलेखों की अधिवक्ताओं से जांच कराई गई तो न्यायालय में न तो उस नाम से कोई फाइल मिली और न ही संबंधित मुकदमे का कोई रिकॉर्ड पाया गया।

 

इसके बावजूद नायब तहसीलदार द्वारा कथित फर्जी चकबंदी आदेश और संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर एडीएम (एफआर) न्यायालय में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई। इस कार्रवाई के बाद पूरे क्षेत्र में तहसील प्रशासन की भूमिका को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

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पीड़ित पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व में कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा मोहम्मद राशिद की फाइल गायब करवा दी गई थी, ताकि असली अभिलेख और साक्ष्य मिटाए जा सकें। उनका कहना है कि कई बार नायब तहसीलदार को फर्जी साक्ष्यों की जानकारी दी गई, लेकिन इसके बावजूद निष्पक्ष जांच करने के बजाय एकतरफा रिपोर्ट लगा दी गई।

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गांव और क्षेत्र के लोगों में इस पूरे मामले को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि तहसील स्तर पर ही फर्जी दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट लगने लगेगी, तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा। अब पीड़ित पक्ष ने मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषी अधिकारियों और फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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यह मामला वर्तमान समय में पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग प्रशासन से निष्पक्ष जांच एवं न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

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