Jharkhand News: सिंचाई योजनाओं के नाम पर आवंटित करोड़ों रुपयों का सही उपयोग सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती

Jharkhand News: Ensuring the proper utilization of crores of rupees allocated for irrigation schemes poses a major challenge.

✍️ ​संजय पांडेय, वरिष्ट पत्रकार
जब लगातार प्रयास किया जाए तो सफलता मिलनी तय है। झारखंड प्रदेश का पलामू प्रमंडल, जो लंबे समय से अकाल और सूखे’ के पर्याय के रूप में राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा करता था, अब अपनी तकदीर खुद बदल रहा है। यहाँ की पथरीली जमीन और ढलानी भूगोल अब जल संकट के विरुद्ध एक बड़े जन-आंदोलन का गवाह बन रहा है।

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कोयल, अमानत और औरंगा नदियों की गोद में बसे इस क्षेत्र में जल संरक्षण की छोटी-छोटी कोशिशें अब एक वृहद सामाजिक बदलाव की शक्ल ले चुकी हैं। ​बीते कुछ वर्षों में पलामू और गढ़वा के सुदूरवर्ती इलाकों में जहाँ पहले बारिश का पानी पहाड़ों से बहकर व्यर्थ चला जाता था, वहीं अब मेड़बंदी, ट्रेंच-सह-बंडिंग और छोटे चेक-डैमों के जरिए पानी को रोकने की कोशिश की गई है। ​सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो भू-गर्भ जल स्तर में सुधार के प्राथमिक संकेत उत्साहजनक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी गति से जल संचयन जारी रहा, तो अगले पांच वर्षों में सिंचाई के लिए मानसूनी वर्षा पर निर्भरता 30% तक कम की जा सकती है।
​पत्रकारिता के दौरान जमीनी हकीकत खंगालने पर यह स्पष्ट होता है कि जल उपलब्धता का सीधा संबंध पलायन से है। पलामू प्रमंडल से हर साल हजारों की संख्या में मजदूर ईंट-भट्ठों और महानगरों की ओर पलायन करते थे। लेकिन, जिन गाँवों में सिंचाई की सुविधा पहुँची है, वहाँ रबी की फसल और सब्जी उत्पादन ने किसानों को गाँव में ही रोजगार के अवसर दिए हैं।

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अब लेस्लीगंज और पांकी जैसे क्षेत्रों के किसान टमाटर, मटर और मिर्च की खेती कर अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर रहे हैं। लेकिन अब भी एक बड़ी समस्या है वह है सिंचाई योजनाओं के नाम पर आवंटित करोड़ों रुपयों का सही उपयोग सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। ​जिला प्रशासन को सोशल ऑडिट की ओर बढ़ना होगा। कई सवाल हैं जिसका जवाब खोजा जा रहा हैं क्या योजना का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँच रहा है? क्या बनाए जा रहे चेक-डैम और तालाब पहली बारिश को झेलने के लिए सक्षम हैं? किसानों को ‘ड्रिप इरिगेशन’ और ‘स्प्रिंकलर’ जैसी कम पानी वाली सिंचाई पद्धतियों से जोड़ना अनिवार्य है। उक्त सभी सवालों को लेकर एक मास्टर प्लान तैयार कर लगातार कार्य करने की जरूरत है। ​वहीं, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं
​किसी भी राज्य या क्षेत्र का विकास केवल सरकारी फाइलों से संभव नहीं है। इस ‘जल क्रांति’ में सभी की भूमिका एक प्रहरी की है।

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​झारखंड का उज्ज्वल भविष्य यहाँ की खनिज संपदा से अधिक यहाँ की ‘जल संपदा’ और ‘मानव संसाधन’ के सही प्रबंधन पर टिका है। इसके अलावा कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं जो इस प्रकार हैं:
​ पलामू की पथरीली जमीन पर 18-20% ढलान, जिससे पानी संचयन कठिन है इसका ​समाधान ‘खेत का पानी खेत में, गाँव का पानी गाँव में’ के मंत्र पर अमल करके हो सकता है। यही ऐसा हो जाता है तब पलायन में कमी लाई जा सकती है।

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