झारखंड को ज़रूरत है एक सशक्त राजनैतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शी प्रशासन की

Jharkhand needs strong political will and transparent administration.

झारखंड, जिसे ‘रत्नागर्भा’ कहा जाता है, अपनी प्राकृतिक संपदा और खनिज संसाधनों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। लेकिन विडंबना यह है कि देश का 40% खनिज समेटे हुए यह राज्य आज भी कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। ​हम बात करते हैं अपने ​झारखंड प्रदेश की। साल 2000 में जब बिहार से अलग होकर झारखंड एक नए राज्य के रूप में उभरा था, तब यहां के सभी लोगों की आँखों में एक ही सपना था अपुन दिशुम, अपुन राज’ (अपना देश, अपना राज)। लेकिन ढाई दशक बीत जाने के बाद भी, झारखंड विकास की दौड़ में पिछड़ता नज़र आ रहा है। यहाँ की समस्याएँ केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक भी हैं।
​झारखंड की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है वह है विस्थापन। राज्य में खदानों, बांधों और बड़े उद्योगों के लिए लाखों एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की गई। ‘विकास’ तो हुआ, लेकिन उन आदिवासियों और मूलवासियों का क्या जिनकी ज़मीनें ली गईं? प्रदेश का सबसे खनिज बहुल्य जिला धनबाद का झरिया क्षेत्र दशकों से भूमिगत आग की चपेट में है। यहाँ के हज़ारों परिवार मौत के साये में जी रहे हैं, लेकिन पुनर्वास की गति कछुआ चाल से भी धीमी है। कई परियोजनाओं में विस्थापितों को न तो उचित मुआवजा मिला और न ही रोजगार। यह समस्या आज भी जन-आंदोलनों का मुख्य केंद्र है। ​झारखंड में भारी उद्योग (जैसे HEC, टाटा स्टील, बोकारो स्टील प्लांट) होने के बावजूद स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार एक चुनौती बना हुआ है। हर साल हज़ारों युवा बेहतर मजदूरी की तलाश में दिल्ली, मुंबई और दक्षिण भारत के राज्यों की ओर रुख करते हैं। लॉकडाउन के समय हमने देखा था कि झारखंडी मजदूरों की संख्या देश के हर कोने में कितनी अधिक है।

​कौशल विकास का अभाव: सरकारी आँकड़ों के अनुसार, राज्य में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अक्सर ऊपर रहती है। उच्च शिक्षा के लिए भी युवाओं को राज्य से बाहर जाना पड़ता है। ​झारखंड की पहचान यहाँ के घने जंगलों और नदियों से है। लेकिन आज यह पहचान संकट में है। प्रदेश में ​अवैध खनन का धंधा लंबे समय से चला आ रहा है। पत्थर और बालू का अवैध खनन न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि इससे सरकारी राजस्व को भी भारी चपत लग रही है। नदियाँ सूख रही हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। हाथी-मानव द्वंद्व: जंगलों के कटने के कारण हाथियों के झुंड अब गाँवों में घुस रहे हैं। हर साल दर्जनों लोग इस संघर्ष में अपनी जान गंवाते हैं।
कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव : ​राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) की रिपोर्ट बताती है कि झारखंड में बच्चों और महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया की स्थिति चिंताजनक है। गाँवों में स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) की स्थिति जर्जर है। कहीं डॉक्टर नहीं हैं, तो कहीं दवाइयाँ उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर बीमारियों के लिए आज भी मरीज़ों को रिम्स (RIMS) रांची या राज्य के बाहर भागना पड़ता है। शिक्षा की कमी और अंधविश्वास के कारण आज भी राज्य के ग्रामीण इलाकों में ‘डायन’ के नाम पर महिलाओं की हत्या कर दी जाती है। यह एक गंभीर सामाजिक कलंक है। ​झारखंड के गठन के बाद से ही राज्य ने लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता देखी है। किसी भी मुख्यमंत्री ने शुरुआती वर्षों में अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया, जिसका सीधा असर नीतियों के कार्यान्वयन पर पड़ा। नौकरशाही और राजनीति में भ्रष्टाचार के मामले अक्सर चर्चा में रहते हैं। मनरेगा से लेकर खनन तक, घोटालों की खबरें विकास की गति को बाधित करती हैं। झारखंड की वर्तमान परिदृश्य को लेकर कई ​समाजशास्त्री और अर्थशास्त्रियों या मानते है कि झारखंड को अपनी समस्याओं से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम तत्काल उठाने होंगे जो इस प्रकार है। ​ केवल खनिज पर निर्भर न रहकर कृषि और लघु उद्योगों (MSME) को बढ़ावा देना होगा। नियोजन और स्थानीयता नीति को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाना होगा ताकि युवाओं को रोजगार मिल सके। गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और उच्च शिक्षा ही पलायन को रोक सकती है। मतलब साफ है कि झारखंड की समस्याएँ गहरी हैं, लेकिन समाधान नामुमकिन नहीं। राज्य के पास पर्याप्त संसाधन और मेहनती जनशक्ति है। ज़रूरत है तो बस एक सशक्त राजनैतिक इच्छाशक्ति और पारदर्शी प्रशासन की, ताकि ‘अबुआ राज’ (हमारा राज) का सपना वास्तव में धरातल पर उतर सके।

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