अपनी ही जमीन पर ‘बेगाने’ होते झारखंड के लोग, झारखंड राज्य में विस्थापन का गहराता दंश

The people of Jharkhand are becoming strangers on their own land; the pain of displacement deepens in the state of Jharkhand.

झारखंड प्रदेश नदियों, पहाड़ों और वनों के घिरा हुआ है। झारखंड, जिसे कुदरत ने खनिजों का अपार भंडार सौंपा, आज वही वरदान यहाँ के मूलवासियों और आदिवासियों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। विकास की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं, खदानों और बांधों के शोर के बीच उन हजारों परिवारों की चीख दब गई है, जिन्हें उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया। राज्य के विभिन्न हिस्सों से आती विस्थापन की खबरें अब केवल प्रशासनिक फाइलें नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी का जीता-जागता दस्तावेज बन चुकी हैं।
जल, जंगल और जमीन का टूटता संघर्ष: झारखंड की पहचान ‘जल, जंगल और जमीन’ से है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण की दौड़ ने इस पहचान पर प्रहार किया है। धनबाद के झरिया की धधकती आग हो, चाईबासा की लौह-अयस्क खदानें हों, या फिर हटिया और बोकारो जैसे औद्योगिक क्षेत्र—हर जगह कहानी एक ही है। जमीन अधिग्रहित कर ली गई, लेकिन बदले में मिला ‘पुनर्वास’ आज भी एक अधूरा वादा है। झारखंड प्रदेश में कई
प्रमुख ज्वलंत मुद्दे हैं जिनकी चर्चा करनी जरूरी है।
पुनर्वास नीति की विफलता: सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। विस्थापितों को अक्सर ऐसी जगहों पर बसाया जाता है जहाँ न पीने का साफ पानी है, न रोजगार के साधन और न ही शिक्षा की व्यवस्था।
धनबाद जिला अंतर्गत झरिया कोलफील्ड्स का संकट: दुनिया के सबसे बड़े भूमिगत आग वाले क्षेत्र झरिया में हजारों परिवार मौत के साये में जी रहे हैं। पुनर्वास की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि कई पीढ़ियां बेलगड़ा (पुनर्वास स्थल) जाने के इंतजार में ही गुजर गईं।
प्रदेश में रोजगार का अभाव: स्थानीय लोगों का आरोप है कि जमीन लेने वाली कंपनियां बाहरी लोगों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि विस्थापित परिवार मजदूरी करने पर मजबूर हैं। “जमीन भी गई और पहचान भी यह वाक्य यहाँ के युवाओं के बीच आम हो चुका है। राज्य के समाजशास्त्री का कहना है कि “विस्थापन केवल भौतिक नहीं होता, यह सांस्कृतिक संहार (Cultural Genocide) है। जब एक आदिवासी अपनी जमीन छोड़ता है, तो वह अपने पूर्वजों की यादें, अपनी भाषा और अपनी पूजा पद्धति भी खो देता है। आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में विस्थापित होने वाले लोगों में 40% से अधिक आदिवासी समुदाय से हैं।

जब जब झारखंड में चुनाव तो तिथि घोषित होती है तब तब विस्थापन का मुद्दा राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में शीर्ष पर आ जाता है। सत्ता पक्ष जहां पिछली सरकारों पर दोष मढ़ता है, वहीं विपक्ष इसे वर्तमान सरकार की विफलता बताता है। हालिया ‘स्थानीयता नीति’ और ‘खतियान’ आधारित नियोजन की मांग भी कहीं न कहीं इसी विस्थापन के डर से उपजी है। सवाल है कि क्या हमारे बच्चों का भविष्य केवल धूल और धुएं में ही बीतेगा? यह प्रश्न आज सभी के जेहन में है। झारखंड प्रदेश में तत्काल उक्त सभी समयों से संबंधित बातों की समाधान की दरकार है। झारखंड को यदि वास्तव में समृद्ध बनाना है, तो ‘विकास’ की परिभाषा में मानवीय चेहरा जोड़ना होगा। केवल मुआवजा दे देना पर्याप्त नहीं है; विस्थापितों को सम्मानजनक जीवन, कौशल विकास और भविष्य की सुरक्षा देना सरकार और कॉर्पोरेट जगत की नैतिक जिम्मेदारी है। जब तक ‘विकास’ और ‘विस्थापन’ के बीच का यह असंतुलन खत्म नहीं होगा, तब तक झारखंड के गांवों से उठने वाला विरोध का स्वर शांत नहीं होगा।

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